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NIGAHEY
Submitted by Preeti Prayaga   
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 5.0

Poem on Eye

तेरी निगाहो मे देखी है दुनिया मेरी
प्यार के इज़हार मे पाई है जन्नत मेरी
डूबता चला हू उनकी गहराई मे
फिर भी परिन्दो सी रिहाई महसूस करता हू
सांस रुक जाती है जब झुकती है पलके
जान आती है देख कर चिल्मन उठ्ते
बिन काजल शृंगार के भी मोहक है वो
मन की वीणा  पे बजा लेती है सात सुर वो
शोखिया और शराब से घुली हुई
जिनसे पी लेता हू घूट चुपके से
कह्ते है शराब ले जाता है रुस्वाई की और्
मंजूर  है ये रुस्वाई मुझे ज़िन्दगी भर के लिये s

 

 
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